IGKV रायपुर में राजीव सिंह ने बताया ग्रामीण उद्यमिता का परिवर्तनकारी सामर्थ्य
रायपुर, 13 अगस्त 2026:
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV), रायपुर में 13 अगस्त 2026 को “ग्रामीण उद्यमिता: नवाचार, उद्यम और सतत आजीविका” विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और भावी उद्यमियों ने भाग लिया। सेमिनार का उद्देश्य यह समझना था कि नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से ग्रामीण भारत में टिकाऊ आजीविका और रोजगार के नए अवसर कैसे विकसित किए जा सकते हैं।
Sansar Green के संस्थापक राजीव सिंह ने कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। झारखंड के प्रमुख कृषि उद्यमी, पर्यावरणविद् और प्राकृतिक खेती विशेषज्ञ के रूप में पहचान रखने वाले सिंह को सतत कृषि, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जैविक कृषि आदानों, पौधरोपण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण उद्यम विकास का व्यापक अनुभव है। वह आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कृषि विशेषज्ञ के रूप में किसानों के साथ व्यावहारिक कृषि ज्ञान भी साझा कर चुके हैं।
कार्यक्रम में IGKV के कुलपति प्रो. गिरीश चंदेल, अनुसंधान सेवाओं के निदेशक डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी, विस्तार सेवाओं के निदेशक डॉ. एस. एस. टुटेजा, डीन डॉ. आरती गुहे, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, शिक्षक और विश्वविद्यालय की अनुसंधान एवं कृषि विस्तार व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
अपने मुख्य संबोधन में राजीव सिंह ने कहा कि ग्रामीण भारत को अब केवल कृषि उपज और कच्चे माल के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वैज्ञानिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक, उद्यमिता और बाजार तक पहुंच के उचित समन्वय से गांव नवाचार, प्रसंस्करण, विनिर्माण, मूल्य संवर्धन और रोजगार सृजन के प्रभावी केंद्र बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में किसान मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्त्वों की सही जानकारी के बिना ही उर्वरकों और अन्य कृषि आदानों का प्रयोग करते हैं। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है, आदानों की उपयोग-दक्षता कम हो सकती है और लंबे समय में मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नियमित मृदा परीक्षण, स्थान-विशिष्ट सूक्ष्मजीवी समाधान और फसल-विशिष्ट पोषण प्रबंधन के माध्यम से किसान अधिक वैज्ञानिक निर्णय ले सकते हैं। इससे आवश्यकतानुसार कृषि आदानों का उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है और कम लागत में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
सिंह ने Sansar Green के “मिट्टी से मंडी तक” मॉडल को भी प्रस्तुत किया। यह एक एकीकृत कृषि व्यवस्था है, जो मृदा परीक्षण, मिट्टी और फसल के अनुसार जैविक कृषि आदानों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फसल परामर्श, किसान प्रशिक्षण, उपज संग्रह, मूल्य संवर्धन और बाजार संपर्क को एक मंच पर जोड़ती है।
इस मॉडल में निहित नवाचार की चर्चा करते हुए उन्होंने स्थानीय मिट्टी और जलवायु के अनुकूल लाभकारी सूक्ष्मजीवी स्ट्रेन विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र के लिए विकसित कृषि समाधान दूसरे क्षेत्र में समान परिणाम नहीं दे सकते, क्योंकि मिट्टी की संरचना, तापमान, वर्षा, फसल और खेती की पद्धतियों में काफी अंतर होता है।
उन्होंने कहा कि जैव उर्वरकों और जैविक फसल समाधानों का चयन प्रत्येक क्षेत्र की मिट्टी, फसल, जलवायु और पोषक तत्त्वों की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए। यह स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित दृष्टिकोण कृषि आदानों की दक्षता बढ़ाने, मिट्टी की जैविक सक्रियता को मजबूत करने और किसानों को अधिक विश्वसनीय परिणाम देने में सहायक हो सकता है।
युवाओं के लिए उपलब्ध उद्यमिता के अवसरों की चर्चा करते हुए सिंह ने जैविक कृषि आदान निर्माण, मृदा परीक्षण सेवाओं, बीज उत्पादन, पौधशाला विकास, कृषि मशीनरी सेवाओं, अनाज की सफाई और ग्रेडिंग, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि परिवहन, पैकेजिंग, डिजिटल फसल परामर्श तथा उपभोक्ताओं को सीधे कृषि उत्पाद बेचने जैसे क्षेत्रों को संभावनाशील बताया।
उन्होंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे अपनी उद्यमिता यात्रा की शुरुआत गांवों का भ्रमण करने, किसानों से सीधे संवाद स्थापित करने और जमीनी स्तर की वास्तविक समस्याओं को समझने से करें। उनके अनुसार, सफल ग्रामीण उद्यम वही है जो किसानों को किफायती, व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू किया जा सकने वाला समाधान उपलब्ध कराए तथा उसके लाभ को प्रमाणित भी कर सके।
सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल विपणन के आधार पर किसानों का विश्वास नहीं जीता जा सकता। ग्रामीण उद्यमों को उत्पाद की निरंतर गुणवत्ता, पारदर्शी संवाद, विश्वसनीय तकनीकी मार्गदर्शन और खेतों में सत्यापित परिणामों के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता स्थापित करनी होगी।
मुख्य संबोधन के बाद आयोजित संवाद सत्र में विद्यार्थियों ने स्टार्टअप वित्तपोषण, इनक्यूबेशन, उत्पाद विकास, प्रमाणन, प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण, डिजिटल मार्केटिंग और कृषि उद्यम स्थापित करने से संबंधित चुनौतियों पर प्रश्न पूछे। सिंह ने अपनी उद्यमशीलता यात्रा के अनुभव साझा किए और विद्यार्थियों को पूर्ण व्यावसायिक मॉडल विकसित करने से पहले अपने विचारों का खेतों में परीक्षण और सत्यापन करने की सलाह दी।
प्रो. गिरीश चंदेल ने वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों, स्टार्टअप और ग्रामीण उद्योगों से जोड़ने में कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उद्यमिता आधारित कृषि शिक्षा विद्यार्थियों को नवप्रवर्तक और रोजगार सृजक बनने के लिए प्रेरित कर सकती है।
डॉ. एस. एस. टुटेजा ने वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कृषि तकनीकों को किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए अनुसंधान संस्थानों, कृषि विस्तार व्यवस्था और ग्रामीण उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी ने वैज्ञानिक गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखते हुए शोध के परिणामों को व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रूप से उपयोगी समाधानों में बदलने की जरूरत बताई।
कार्यक्रम का समापन कृषि विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप, किसानों, सरकारी संस्थानों और ग्रामीण समुदायों के बीच मजबूत सहयोग के आह्वान के साथ हुआ। सेमिनार ने यह संदेश दिया कि ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से टिकाऊ आजीविका और रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ मृदा स्वास्थ्य, कृषि उत्पादकता, स्थानीय मूल्य संवर्धन और किसानों की बाजार तक पहुंच को भी मजबूत किया जा सकता है।
